Tuesday, March 31, 2009

Sailja को रास आया अंबाला!

सिरसा. चार चुनाव में पिता और दो चुनाव में खुद की जीत, लेकिन फिर भी क्षेत्र से मोहभंग। सिरसा संसदीय क्षेत्र से छह चुनावी विजय परिवार की झोली में आने के बावजूद कुमारी शैलजा को यह लोकसभा क्षेत्र रास नहीं आ रहा। पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने सिरसा से किनारा कर अंबाला से किस्मत आजमाई और जीत गईं।
अब मौजूदा चुनाव में वह फिर अंबाला से टिकट हासिल करने की जुगत में हैं। अंबाला संसदीय क्षेत्र में उनकी बढ़ी गतिविधियां भी कुछ ऐसा ही संकेत दे रही हैं। संयुक्त पंजाब से अलग होकर हरियाणा के गठन के बाद से शैलजा परिवार के लिए सिरसा संसदीय क्षेत्र सबसे सुरक्षित रहा।
स्वतंत्र प्रदेश में 1967 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में शैलजा के पिता दलबीर सिंह ने कांग्रेस के टिकट पर पहली जीत हासिल की। यही नहीं, 1971, 1980 और 1984 के लोकसभा चुनावों में भी उन्होंने जीत हासिल कर संसदीय क्षेत्र में अपने जनाधार का लोहा मनवाया। 1988 में दलबीर सिंह का निधन हो गया।
इस कारण हुए उप चुनाव में पार्टी ने उनकी बेटी कुमारी शैलजा को मैदान में उतारा। बदकिस्मती से शैलजा यह चुनाव हार गईं। देवीलाल की पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े हेतराम ने उन्हें हरा दिया।
बड़े नेता दिखाने लगे बेरुखी : शैलजा के सिरसा में सक्रिय रहते कुछ ऐसी घटनाएं हुईं जिनके चलते धीरे-धीरे जिले के वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं लक्ष्मण दास अरोड़ा, जगदीश नेहरा व रणजीत सिंह और उनके समर्थकों ने तो शैलजा से बोलचाल तक ही बंद कर दी। यहां तक कि भजनलाल और शैलजा में भी दूरियां हो गईं।
बस इसके बाद शैलजा का सिरसा सीट से मोहभंग हो गया और उन्होंने अंबाला को सुरक्षित ठिकाना मान लिया। अब यह देखना है कि शैलजा फिर से पुराने संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ती हैं या नए ठौर को ही अपना मानकर वहां से किस्मत आजमाती हैं। वैसे, राजनीतिक पंडितों को उनके सिरसा से लड़ने की संभावना कम ही नजर आ रही है।

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