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Saturday, November 28, 2009

हजारों साल पुरानी संस्कृति का साक्षी Banawali

फतेहाबाद-गांव नागपुर संपर्क मार्ग पर बसा गांव बनावली का किला अपने अंदर करीब पांच हजार वर्ष पुरानी हड़प्पा संस्कृति का इतिहास समेटे हुए है। खुदाई के दौरान ऐतिहासिक किले में दबी हड़प्पा संस्कृति (2600-2400 ईपू) के तीनों कालों के लोगों के रहन-सहन, खान पान, धार्मिक मान्यताओं व अन्य सभी प्रकार की जानकारियां मिलती हैं। करीब 32 एकड़ क्षेत्र में फैली इस प्राचीन धरोहर की पहचान 1960 के आसपास हुई तथा 1974 से 1988 तक यहां खुदाई का कार्य किया गया। अब इस ऐतिहासिक धरोहर को संजोने के लिए बनावली को विश्व धरोहर में शामिल करने का प्रस्ताव यूनेस्को के पास भेजने का निर्णय किया गया है। अगर यह योजना सिरे चढ़ती है तो निश्चित तौर पर इतिहास की इस महत्वपूर्ण कड़ी को सहेजकर रखा जा सकेगा। खुदाई के दौरान मिली ऐतिहासिक महत्व की वस्तुओं से हड़प्पाकालीन सभ्यता की बहुत महत्वपूर्ण जानकारी मिल पाई।
1988 के बाद यहां अभी तक किसी प्रकार की खुदाई नहीं हुई है। यहां सबसे पहले हरियाणा पुरातत्व विभाग ने 1974 में खुदाई की तथा 1977 तक समय-समय पर यह कार्य किया जाता रहा। इसमें उसे कुछ विशेष हाथ नहीं लगा। इसके बाद भारतीय पुरातत्व विभाग ने 1977 में इसकी खुदाई का कार्य अपने हाथों में लिया। इससे इस स्थान के हड़प्पाकालीन सभ्यता से जुड़े होने का निष्कर्ष निकाला गया। भारतीय पुरातत्व विभाग ने इसे 4 सितंबर 1982 को अपने कब्जे में लिया और 1988 तक खुदाई का काम जारी रखा। खुदाई के दौरान मिले शहर के किले का मुख्य गेट पक्की र्इंटों से तथा अन्य पूरा हिस्सा कच्ची ईटों से बना है। करीब 32 एकड़ में फैले इस पुरातत्व महत्व के किले पर फिलहाल करीब 12 एकड़ भूमि पर ही विभाग का कब्जा है। जबकि करीब 24 एकड़ जमीन पर किसानों द्वारा खेती की जा रही है।

इतिहासकार डा. मुनीष नागपाल ने कहा कि यदि इसे विश्व धरोहर का दर्जा मिलता है तो इससे आने वाली पीढि़यों को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। इसी प्रकार से डॉ. कृष्ण कुमार ने कहा कि यदि ऐसा हो पाया तो इसे संग्रहित करने के लिए पर्याप्त धन की व्यवस्था हो पाएगी। इतिहासकार डॉ. सुरेंद्र पाल सिंह ने कहा कि ऐसा होने से विश्व में बनावाली के साथ-साथ जिला व प्रदेश का नाम भी रोशन होगा। महानगरीय संस्कृति थी बनावली.. वस्तुओं की चूडि़यां भी पहनती थीं। इस क्षेत्र से टेरोकोटा, स्पायरल कापर हेयर-पिन, देवियों की मूर्तियां आदि भी मिले हैं।

कहां-कहां मिले हैं ऐसे स्थान
करीब पांच साल पुरानी इस सभ्यता के इससे मिलते जुलते अवशेष हिसार जिले के गांव राखी, गुजरात के लोथल व राजस्थान के कालीभंगा में भी पाए गए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि हड़प्पा संस्कृति उत्तर भारत से होती हुई अफगानिस्तान व पाकिस्तान तक फैली हुई थी। हड़प्पा सभ्यता के लोग नगरों में रहते थे। जिनकी गलियां आर-पार गुजरती थीं। इसी प्रकार इस सभ्यता में बनाए गए मकान भी आरपार होते थे।
क्या-क्या मिला खुदाई में
विभाग को खुदाई के दौरान अंडाकार तथा गोलाकार चूल्हों से लैस सुनियोजित ढंग से बनाए गए मकान, कांच से बने मर्तबान तथा कलश, परात, प्यालियां, कुठार, जार, सोने के मुकने, मूल्यवान पत्थर, मृदभांड, छेलखड़ी, मिट्टी की चूडि़यां, शंख व तांबा सहित अनेक वस्तुएं मिलीं। इसके अलावा जानवरों एवं फूलों के चित्रों बने हुए खाना खाने व पकाने के हांडी बीकर, परात, पानपात्र, एस आकार के जार, ईट, चर्ट ब्लेड, हाथी दांत व हड्डियों के खिलौने, सोने तथा मूल्यवान पत्थरों के मनके, सोने की पत्ती चढे़ तांबे के आभूषण, मिट्टी से बनी जानवरों की आकृतियां, अभिलेख युक्त मुद्रा तथा मुद्रिकाएं आदि के अवशेष मिले। इसके अलावा जौ के जले अवशेष व मनकों की फैक्टरी भी मिली है।

Wednesday, May 20, 2009

पोलड़ को खाली कराने की फिर तैयारी, नोटिस


Kaithal : पुरातात्विक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण गांव Pollad को ग्रामीणों से खाली कराने के लिए पुरातत्व विभाग ने एक बार फिर कमर कस ली है। इसके लिए जारी नोटिस से लोग परेशान हैं और किसी कीमत पर गांव खाली नहीं करने पर अड़े हुए हैं। गांव के सरपंच व उप-सरपंच को विभाग की ओर से मिले नोटिस के अनुसार 25 मई को पुरातत्व विभाग से संबंधित भूमि की चारदीवारी का काम शुरू किया जाएगा। यह काम सब सर्कल इंचार्ज (हिसार) बीबी कौल की देखरेख में होगा। विभाग ने उपायुक्त से भी पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराने का अनुरोध किया है। नोटिस में चेताया गया है कि जमीन के चारों और चारदीवारी बनाने के कार्य में बाधा डालने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। पोलड़ में पुरातत्व विभाग की 47 एकड़ 3 कनाल 1 मरला भूमि की निशानदेही 9 नवंबर 2005 को की गई थी। दूसरी तरफ, ग्रामीणों ने कहा है कि पुरातत्व विभाग के इस कदम का पुरजोर विरोध करेंगे और मरते दम तक पोलड़ को खाली नहीं करेंगे।


इससे अच्छा हमें पाकिस्तान भेज दो

सीवन (कैथल) : पाकिस्तान से उजड़ने के बाद पोलड़ गांव ने हमें आसरा दिया था। अब हमें यहां से भी उजाड़ा जा रहा है। आखिर हम जाएं तो कहां जाएं। अगर सरकार गांव को उजाड़ना ही चाहती है तो फिर हमें वापस पाकिस्तान भेज दें। यह कहना है पोलड़ गांव के लोगों का, जिन्हें गांव खाली करने का नोटिस मिल चुका है। पुरातत्व विभाग ने गांव खाली करने के लिए 25 मई की तारीख तय की है।
गांव खाली करने की तारीख तय होने के बाद यहां के बाशिंदे यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे क्या करें। इस आदेश के बाद से ही गांव में खामोशी छाई है। गांव के नरेंद्र कौर, विमल, सुरेंद्र, बचन, करतार, किशन, बलदेव, गुरनाम और पाला सिंह अपने भविष्य के बारे में सोच कर चिंतित हैं।
उनका कहना है कि उन्होंने अपने खून-पसीने की कमाई से यहां अपना आशियाना बनाया और अब उसी को ढहाने की तैयारी चल रही है। अगर सरकार उनके बारे में कुछ नहीं सोच सकती तो फिर उनकी एक ही मांग है कि उन्हें फिर से वापस पाकिस्तान भेज दिया जाए।
गौरतलब है कि पुरातत्व विभाग की 47 एकड़ 3 कनाल एक मरला जमीन पर हुए कब्जों को छुड़वाने के लिए पंजाब के मुंशी राम ने लगभग 5 वर्ष पूर्व हाईकोर्ट में अपील की थी। उस पर अमल करते हुए कोर्ट ने गांव के 580 लोगों को गांव खाली करने का नोटिस भेजा था। शुरुआत में ग्रामीणों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और न ही पुरातत्व विभाग ने इन्हें मकानों का निर्माण करने से रोका।
तीन बार हो चुकी है खुदाई : भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने महाभारत व वैदिक कालीन अवशेषों को खोजने के लिए गांव में तीन बार (1888, 1933 और 1938) खुदाई करवाई लेकिन विभाग को उस दौरान पोलड़ गांव में कुछ नही मिला था।
तमाम सरकारी सुविधाएं हैं गांव में : पाकिस्तान से उजड़कर आए लोगों ने जब पोलड़ गांव बसाया तो सरकार ने यहां स्कूल, जलापूर्ति, ओढ़-राजपूत चौपाल, श्मशान भूमि, सरस्वती मंदिर, पीर की मजार, गुरुद्वारा, तालाब, बस शेल्टर बनाने तथा गलियों और नालियों को पक्का कराने के लिए करोड़ों रुपए की ग्रांट दी थी।

Friday, April 3, 2009

दक्षखेड़ा की ‘सुंदरी’ बनेगी पुणे की ‘रानी’

रोहतक जिले के दक्षखेड़ा में जारी खुदाई में पुरातत्वविदों को आभूषणों से सज्जित एक महिला का कंकाल मिला है। इस हड़प्पाकालीन कंकाल को यहां के कब्रिस्तानों में अब तक मिले कंकालों में से सबसे सुंदर माना जा रहा है। इसे पुणे स्थित डेक्कन कॉलेज के संग्रहालय में स्थापित किया जाएगा।
उत्खनन कार्य के प्रभारी विवेक दांगी ने बताया कि मिट्टी में दबे कंकाल को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए उस पर एक विशेष प्रकार के रसायन का छिड़काव किया गया है। उत्खनन कार्य के निदेशक डॉ. वसंत शिंदे ने बताया कि मृत्यु के वक्त महिला की उम्र करीब 26 वर्ष रही होगी। उसके दाएं हाथ में तांबे की और बाएं हाथ में शंख की चूड़ियां हैं।
पैरों में मनकों की पाजेब व गले में हार है। इससे लगता है कि महिला काफी अमीर रही होगी। करीब चार हजार वर्ष पुराने इस कंकाल से मालूम होता है कि महिला के नैन-नक्श तीखे थे। कंकाल में दांत अब भी सुरक्षित हैं। शिंदे ने बताया कि यह कंकाल म्यूजियम में सर्वाधिक आकर्षित करेगा। म्यूजियम में इसका बेसब्री से इंतजार किया जा रहा है।

Friday, January 30, 2009

Maham में हड़प्पाकालीन कब्रिस्तान मिला

पांच हजार वर्ष पूर्व विकसित हड़प्पाकालीन सभ्यता को समेटे 'दक्ष खेड़ा' में नए इतिहास की परतें खुल रही है। पुरात्ववेताओं ने नार्थ इंडिया का हड़प्पाकालीन सबसे बड़ा कब्रिस्तान खोजा है।
शोध में लगे महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक एवं डेक्कन कालेज विश्व विश्वविद्यालय, पुणे तथा Huminity Research Institute क्योटा के शोधार्थियों ने उत्कृष्ट प्राचीन सभ्यता के अलावा आरंभिक हड़प्पाकालीन सभ्यता का नार्थ इंडिया में सबसे बड़ा कब्रिस्तान खोजने में सफलता पाई है।
महम खंड के बड़े गांव फरमाणा में दक्ष खेड़ा के नाम से प्रदेश भर में विख्यात एक भूखंड प्राचीन इतिहास की परतें खोल रहा है। पुरातत्व दक्ष खेड़ा के पास जहां पांच हजार साल से अधिक पूर्व की आरंभिक हड़प्पाकालीन सभ्यता का नगर विकसित था। वहीं इससे कुछ ही दूरी पर उक्त प्राचीन सभ्यता को समेटे विशाल नगर के अस्तित्व को सार्थक करता विशाल कब्रिस्तान भी है। कब्रिस्तान मिलने के बाद प्राचीन इतिहास की समृद्धि की खोजबीन में लगे शोधार्थी ने बताया कि दक्ष खेड़ा के विशाल नगर का यह कब्रिस्तान नार्थ इंडिया में हड़प्पाकालीन सभ्यता का सबसे बड़ा कब्रिस्तान है। लगभग तीन हेक्टेयर में फैले इस कब्रिस्तान से ही दक्ष खेड़ा पर विकसित विशाल नगर की भव्यता व संपन्नता का अंदाजा लगाया जा सकता है। उत्खनन के दौरान इस विशाल कब्रिस्तान में अब तक 68 लोगों की कब्रें मिल चुकी हैं और संभावनाओं के चलते उत्खनन जारी है। खास बात यह है कि लाश के साथ मिलने वाले मिट्टी के बर्तन एवं अन्य सामान से मरने वाले की आर्थिक स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। कब्र में लाश के साथ मिलने वाले छोटे व कम मिट्टी बर्तन आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग व्यक्ति की पहचान कराते है जबकि बड़े व अधिक बर्तन व अन्य धातु की वस्तुएं संभवत: आर्थिक संपन्नता का परिचायक है। उत्खनन से आरंभिक हड़प्पाकालीन नगर की सुव्यवस्था सामने आई है जो वर्तमान में हुडा आदि द्वारा बनाये जा रहे सेक्टरों को भी मात दे रही है। विशाल चौराहे व लंबी चौड़ी समांतर गलियां तत्कालीन इतिहास की संपन्नता का विस्तृत अवलोकन कराने में समर्थ है।