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Wednesday, June 10, 2009

चार महीने में जन्मी दूसरी Clone कटड़ी

कल्पना के शहर ने साइंस के क्षेत्र में नई उड़ान भरी है। अब गरिमा ने करनाल के NDRI (राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान) की गरिमा बढ़ा दी है। चार माह के भीतर ही यहां के वैज्ञानिकों ने विश्व की दूसरी क्लोन कटड़ी पैदा कराने में सफलता हासिल कर ली। मुर्राह नस्ल की यह कटड़ी पूरी तरह स्वस्थ है। इससे पशुओं में दूध की क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी। एनडीआरआई के वैज्ञानिकों ने पहले भी एक क्लोन कटड़ी पैदा कराई थी। लेकिन, 6 फरवरी को जन्मे दुनिया की पहली क्लोन कटड़ी की हफ्ते भर के अंदर ही न्यूमोनिया के कारण मौत हो गई थी। इसके बाद संस्थान ने दो और क्लोन कटड़ी क्रमश: मई और जून में पैदा करने की घोषणा की थी, लेकिन मई में पैदा होने वाली क्लोन कटड़ी गर्भ में ही मर गई थी। दो बार विफल रहे वैज्ञानिकों ने इस बार भू्रण में सोमेटिक कोशिकाओं का प्रयोग करके क्लोन को विकसित किया। शनिवार दोपहर 11 बजे सीजेरियन आपरेशन शुरू हुआ। लगभग पौने घंटे बाद कटड़ी को सकुशल गर्भ से निकाला गया। जन्म के समय उसका वजन 43 किलो था। हालांकि कटड़ी के पैदा होने की तारीख 10 जून थी, लेकिन गर्भ में वजन ज्यादा होने की वजह से उसे चार दिन पहले आपरेशन करके स्वस्थ पैदा किया गया।
कटड़ी के भ्रूण से बनाया क्लोन : एनडीआरआई के निदेशक डा। एके श्रीवास्तव ने जागरण से कहा, भैंस के क्लोन शिशु गरिमा का जन्म करा लेने के बाद अब हम एक साथ लाखों क्लोन शिशु यानी एक ही नस्ल के पशु तैयार कर सकते हैं। नस्ल एक होगी तो दुग्ध उत्पादन में भी बढ़ोतरी तय है। डा. श्रीवास्तव ने बताया कि यह क्लोन कटड़ी 6 फरवरी को पैदा हुई कटड़ी से भिन्न है। पहले क्लोन की जन्मदाता कोशिका एक नवजात मुरार्ह नस्ल की कटड़ी के कान से ली गई थी। यह क्लोन भैंस के गर्भ में कटड़ी भ्रूण से तैयार हुआ है। यह परंपरागत क्लोनिंग तकनीकी का संशोधित रूप है। इस तकनीक में पशु के अंडाशयों से डिंबाणु को निकालकर उसे परखनली में परिपक्व किया गया। बाद में उसे एक एंजाइम के साथ उपचारित किया गया। इसके बाद एक हैंड हेल्ड फाइन ब्लेड से नाभिक को निकाला गया। इसके बाद प्रदाता पशु के सोमेटिक कोशिकाओं को प्रजनित किया गया और नाभित रहित डिंबाणु कोशिकाओं व प्रदाता नाभिक को एलेक्ट्रोफ्यूज्ड करके प्रयोगशाला में विकसित किया गया। उसके बाद इस भ्रूण को कटड़ी के जन्म के लिए प्रत्यारोपण किया गया। इस क्लोन कटड़ी को आईसीयू में रखा गया है। चिकित्सक दल 24 घंटे इसके स्वास्थ्य पर नजर रखेगा। उन्होंने कहा कि हैंड गाइडिड क्लोनिंग के सकारात्मक परिणाम सामने आए तो भारत में श्रेष्ठ दुधारू पशुओं की संख्या तेजी से बढ़ेगी। क्लोन कटड़ी के जनक वैज्ञानिक एसके सिंगला, डा. आरएस माणिक, डा. एमएस चौहान, डा. पी पल्टा, डा. शिवप्रसाद, डा. आरएस शाह व डा. ए जार्ज व संस्थान के निदेशक डा. एके श्रीवास्तव व अन्य वैज्ञानिक खुशी से झूम उठे। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डा. मंगला राय व परिषद के पशु विज्ञान के उप महानिदेशक डा. केएम बजरबरूआ ने इस उपलब्धि के लिए वैज्ञानिकों को बधाई दी है। बजरबरूआ ने कहा कि इस समय सर्वश्रेष्ठ सांडों की काफी कमी है। इस तकनीक से इस कमी को कम किया जा सकता है। प्रयोग में हिसार कृषि विश्वविद्यालय के डा. आरएस बिसला, डा. एससी आर्य, संस्थान के चिकित्सक डा. केपीएस तोमर, डा. सुभाष चंद्र व डा. प्रवीण कुमार ने भी योगदान दिया।
दूध की बहेंगीं नदियां! : वैसे तो भारत में इस समय करीब साढ़े अठारह करोड़ पशु हैं लेकिन इनमें दुधारू केवल साढ़े पांच करोड़ हैं। इन दुधारू पशुओं में वे भी शामिल हैं जो दिन भर में महज आधा लीटर दूध देते हैं। गरिमा इस सूरत में बदलाव ला सकती है। असल में क्लोन होने के कारण अब एक ही नस्ल की भैंस पैदा करना संभव हो सकेगा। इससे नस्लों की भिन्नता के कारण पशुओं में कम दूध संबंधी शिकायतों से बचा सकेगा।

Monday, May 11, 2009

गर्भ में मरी विश्व की दूसरी क्लोन कटड़ी

इस वर्ष 11 फरवरी को क्लोन कटड़ी की मौत के बाद एनडीआरआई ने मई और जून में दो क्लोन कटडि़यों को सफलतापूर्वक पैदा करने का दावा किया था। अपने इस दावे के विपरीत अब वह जून में केवल एक क्लोन कटड़ी को पैदा करेगी। संस्थान के सूत्रों के अनुसार मई में पैदा होने वाली क्लोन कटड़ी जन्म लेने से पहले ही मर गई है। लगभग दो महीने पहले ही संस्थान में भैंस का गर्भपात करके क्लोन कटड़ी को निकाला गया था। एनडीआरआई में विश्व की पहली क्लोन कटड़ी इस वर्ष 6 फरवरी को जन्मी थी, लेकिन 11 फरवरी को ही उसकी मृत्यु हो गई थी। हैंडगाइडेड क्लोनिंग तकनीक से बनाई गई पहली क्लोन कटड़ी का वजन जन्म के समय सामान्य वजन से लगभग दस किलो ज्यादा था। कटड़ी के जन्म से जुड़ी खामियों पर मंथन करते हुए राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक हैंडगाइडेड क्लोनिंग तकनीक में और सुधार करने में जुट गए थे। उस समय वैज्ञानिकों ने मई में विश्व की दूसरी क्लोन कटड़ी और जून में तीसरी क्लोन कटड़ी पैदा करने का दावा किया था। क्लोन कटड़ी पैदा करने वाले वैज्ञानिकों के दल में डा. एसके सिंगला, डा. आरएस माणिक, डा. एमएस चौहान, डा. पी पल्टा, डा. आरए शाह व ए जार्ज शामिल हैं। मई में पैदा होने वाली क्लोन कटड़ी की गर्भ में दो महीने पहले मृत्यु हो गई थी। सूत्रों के अनुसार जिस भैंस में यह कटड़ी पल रही थी। उसका नंबर 5257 है। गर्भ में परिस्थितियां असामान्य होने पर भैंस का गर्भपात किया तो क्लोन कटड़ी मर चुकी थी। इस क्लोन कटड़ी का रंग भी हरा बताया जाता है। कटड़ी की मौत के मामले में संस्थान प्रबंधन व वैज्ञानिकों ने चुप्पी साधी हुई है। संस्थान के निदेशक डा. एके श्रीवास्तव से जब बात करने का प्रयास किया गया तो उन्होंने कहा कि वह आउट आफ स्टेशन हैं। सहायक निदेशक डा. एसएल गोस्वामी से बात की गई तो उन्होंने कहा कि इस बारे निदेशक डा. श्रीवास्तव या रजिस्ट्रार डा. रामेश्वर सिंह ही कुछ बता सकते हैं। इस शोध के वैज्ञानिक दल के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. एसके सिंगला से संपर्क किया तो उन्होंने भी पल्ला झाड़ लिया।