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Wednesday, April 1, 2009

Sirsa : तीन जिलों के मतदाता चुनेंगे सांसद

लोकसभा चुनाव में सिरसा संसदीय सीट के लिए सांसद चुनने के लिए संबंधित प्रत्याशियों और उनके समर्थकों को कई तरह की सियासी कसरत करनी पड़ेगी। नरवाना से डबवाली तक इससे पहले लोकसभा चुनाव मैदान में कूदने वाले प्रत्याशियों को सिरसा संसदीय सीट के चुनाव में सिरसा और फतेहाबाद दो जिलों के नौ विधानसभा क्षेत्रों सिरसा, रोड़ी, दड़बाकलां, डबवाली, ऐलनाबाद, फतेहाबाद, रतिया, टोहाना व भट्टू के मतदाताओं से ही संपर्क करना होता था। इस बार उन्हें तीसरे जिले जींद के नरवाना विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं से भी वोट मांगने पड़ेंगे, क्योंकि नए परिसीमन के मुताबिक नरवाना विधानसभा क्षेत्र को भी सिरसा संसदीय सीट के साथ जोड़ दिया गया है।
नए परिसीमन के मुताबिक इस बार सिरसा जिले के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से रोड़ी और दड़बाकलां को खत्म कर दिया गया है और दो नए विधानसभा क्षेत्र के तौर पर कालांवाली व रानियां को बना दिया गया है। सिरसा संसदीय सीट के लिए 9 विधानसभा क्षेत्रों में मतदान होगा जिनमें से 5 विधानसभा क्षेत्र जिला सिरसा के अन्तर्गत आते हैं। सिरसा संसदीय क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले तीन जिलों के 9 विधानसभा क्षेत्रों के कुल 13,06636 मतदाता हैं इन मतदाओं में सिरसा जिले से 6 लाख 72 हजार 390 मतदाता हैं।
भट्टू भी हुआ फतेहाबाद से बाहर
विधानसभा क्षेत्र भट्टू को नए परिसीमन के तहत फतेहाबाद जिले से बाहर कर दिया गया है। उसकी जगह पर जींद जिले के नरवाना विधानसभा क्षेत्र को शामिल किया गया है। इस क्षेत्र से इनेलो सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला व बिजली मंत्री रणदीप सुरजेवाला के बीच उठापटक होती रही है और दोनों ही इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। अलबत्ता रणदीप सुरजेवाला तो अभी भी प्रतिनिधित्व कर ही रहे हैं। आगामी विधानसभा चुनाव में ये दोनों नेता इस क्षेत्र से अपनी किस्मत नहीं आजमा सकेंगे, क्योंकि इस क्षेत्र को आरक्षित सीट कर दिया गया है।

सिरसा सीट में विधानसभा क्षेत्र :

सिरसा, कालांवाली, रानियाँ, डबवाली, एलनाबाद (जिला सिरसा)

फतेहाबाद, टोहाना, रतिया (जिला फतेहाबाद)

नरवाना (जिला जींद)

प्रत्याशी :
बसपा ने राजेश वैद को प्रत्याशी घोषित किया है।

इनेलो ने सीताराम को प्रत्याशी बनाया है।

हजकां और कांग्रेस को अभी उम्मीदवार नहीं मिल पाया है।

Tuesday, March 31, 2009

Sailja को रास आया अंबाला!

सिरसा. चार चुनाव में पिता और दो चुनाव में खुद की जीत, लेकिन फिर भी क्षेत्र से मोहभंग। सिरसा संसदीय क्षेत्र से छह चुनावी विजय परिवार की झोली में आने के बावजूद कुमारी शैलजा को यह लोकसभा क्षेत्र रास नहीं आ रहा। पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने सिरसा से किनारा कर अंबाला से किस्मत आजमाई और जीत गईं।
अब मौजूदा चुनाव में वह फिर अंबाला से टिकट हासिल करने की जुगत में हैं। अंबाला संसदीय क्षेत्र में उनकी बढ़ी गतिविधियां भी कुछ ऐसा ही संकेत दे रही हैं। संयुक्त पंजाब से अलग होकर हरियाणा के गठन के बाद से शैलजा परिवार के लिए सिरसा संसदीय क्षेत्र सबसे सुरक्षित रहा।
स्वतंत्र प्रदेश में 1967 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में शैलजा के पिता दलबीर सिंह ने कांग्रेस के टिकट पर पहली जीत हासिल की। यही नहीं, 1971, 1980 और 1984 के लोकसभा चुनावों में भी उन्होंने जीत हासिल कर संसदीय क्षेत्र में अपने जनाधार का लोहा मनवाया। 1988 में दलबीर सिंह का निधन हो गया।
इस कारण हुए उप चुनाव में पार्टी ने उनकी बेटी कुमारी शैलजा को मैदान में उतारा। बदकिस्मती से शैलजा यह चुनाव हार गईं। देवीलाल की पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े हेतराम ने उन्हें हरा दिया।
बड़े नेता दिखाने लगे बेरुखी : शैलजा के सिरसा में सक्रिय रहते कुछ ऐसी घटनाएं हुईं जिनके चलते धीरे-धीरे जिले के वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं लक्ष्मण दास अरोड़ा, जगदीश नेहरा व रणजीत सिंह और उनके समर्थकों ने तो शैलजा से बोलचाल तक ही बंद कर दी। यहां तक कि भजनलाल और शैलजा में भी दूरियां हो गईं।
बस इसके बाद शैलजा का सिरसा सीट से मोहभंग हो गया और उन्होंने अंबाला को सुरक्षित ठिकाना मान लिया। अब यह देखना है कि शैलजा फिर से पुराने संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ती हैं या नए ठौर को ही अपना मानकर वहां से किस्मत आजमाती हैं। वैसे, राजनीतिक पंडितों को उनके सिरसा से लड़ने की संभावना कम ही नजर आ रही है।